मिमोसा केक ऑटो कैनबिस स्ट्रेन वीक-बाय-वीक गाइड
- 1. ग्रो स्पेसिफिकेशन
- 2. ग्रो सेटअप
- 3. जर्मिनेशन और सीडलिंग स्टेज | सप्ताह 1
- 4. शुरुआती वेज | सप्ताह 2
- 5. मिड वेज | हफ्ते 3-4
- 6. ट्रांजिशन (प्री-फ्लावर) | हफ्ता 5
- 7. अर्ली फ्लावर | हफ्ते 6-7
- 8. मिड फ्लावर (बल्क फेज) | हफ्ते 8-9
- 9. पकना और हार्वेस्ट | हफ्ते 10-11
- 10. सुखाना और क्योरिंग
- 11. परिणाम
- 12. निष्कर्ष
मिमोसा केक ऑटो एक अद्भुत स्ट्रेन है, जिसकी शानदार विशेषताएँ इसे कैनबिस ग्रोअर्स और स्मोकर्स दोनों के लिए बेहतरीन विकल्प बनाती हैं। यह हाईब्रिड ऑटोफ्लावरिंग स्ट्रेन एक अनूठे स्वाद और सुगंध के साथ आता है, जिसमें मिमोसा की मिठास व सिट्रस का स्वाद केक के स्वादिष्ट और धरती से जुड़े नोट्स के साथ मिलते हैं। इसके संतुलित प्रभाव उत्साहवर्धक, रचनात्मक और आरामदायक होते हैं, जिससे यह एक संपूर्ण अनुभव चाहने वालों के लिए बेहतरीन ऑप्शन है।
मिमोसा केक ऑटो को उगाना भी बहुत आसान है, जिससे यह शुरुआती ग्रोअर्स के लिए आदर्श है, जिसे हम आपको अपने वीक-बाय-वीक गाइड में दिखाने वाले हैं। इसमें हम चार सैंपल ग्रो को फॉलो करते हैं और अन्य ग्रो से ली गईं तस्वीरों का भी इस्तेमाल करते हैं। हमें उम्मीद है कि हमारा रिव्यू आपको इतनी ही प्रभावशाली पैदावार और बेहतरीन स्मोक क्वालिटी हासिल करने में मदद करेगा, जो इस शानदार नई जेनेटिक्स के लायक है।
1. ग्रो स्पेसिफिकेशन
मिमोसा केक ऑटो एक अत्यधिक पसंद की जाने वाली स्ट्रेन है, जिसके शानदार गुण ग्रोअर्स और स्मोकर्स दोनों के लिए इसे शानदार विकल्प बनाते हैं। यह हाईब्रिड स्ट्रेन 60% Sativa और 40% Indica से बनी है और इसमें THC कंटेंट 24% तक हो सकता है, जो एक शानदार संतुलित हाई बनाता है, जो उत्साहवर्धक और रिलैक्सिंग दोनों है।

मिमोसा केक ऑटो एक आसान-से-उगाई जाने वाली स्ट्रेन है, जो शुरुआती और अनुभवी दोनों तरह के ग्रोअर्स के लिए उपयुक्त है। इसका फ्लावरिंग पीरियड सिर्फ 9 हफ्तों का है और यह 550 gr/m2 (1.8 oz/ft2) तक की बेहतरीन पैदावार देता है इंडोर में और आउटडोर में प्रति पौधा 160g (5 oz) तक। पौधा XL साइज का है, जिसकी ऊँचाई 110-130 सेमी (43-51 इंच) है, और यह नींबू, मिट्टी और फ्लोरल नोट्स को ब्लेंड करता है, जिससे यह कैनबिस प्रेमियों के लिए एक ज़रूर ट्राई करने वाला स्ट्रेन बन जाता है।
2. ग्रो सेटअप
मिमोसा केक ऑटो स्ट्रेन अब भी काफी नई है, लेकिन कई ग्रोअर्स ने अपनी एक्सपीरियंस साझा की हैं। हम इनमें से चार ग्रो डायरी की विस्तार से चर्चा करेंगे और अन्य से भी कुछ फोटो इस्तेमाल करेंगे। अगर आप खुद मिमोसा केक ऑटो उगाने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो इस सूचना से बहुत मदद मिलेगी। नीचे दी गई टेबल सभी चार ग्रो के सेटअप और स्पेसिफिकेशन दिखाती है। सभी पौधों को इंडोर मीडियम-स्टॉन्ग LED ग्रो लाइट्स के नीचे उगाया गया, जिससे आपको सॉइल और कोको कोयर (दोनों सामान्य ग्रोइंग माध्यम) के बीच तुलना करने का मौका मिलेगा।
| ग्रो स्पेस | लाइट | माध्यम | |
|---|---|---|---|
| A | 1 m2 | 270W LED | कोको / परलाइट |
| B | 1 m2 | 310W LED | सॉइल / परलाइट |
| C | 0.72 m2 | 300W LED | सॉइल / परलाइट |
| D | 0.6 m2 | 140W LED | सॉइल / वर्म कास्टिंग्स |
मिमोसा केक ऑटो की विभिन्न ग्रो डायरीज़ देखकर यह बात साफ है कि यह स्ट्रेन हर सेटअप के हिसाब से खुद को ढाल लेती है और किसी भी ग्रोइंग स्टाइल के लिए उपयुक्त है। तो चाहे आपकी प्लानिंग कुछ भी हो, आप आत्मविश्वास के साथ कह सकते हैं कि यह ऑटोफ्लावरिंग स्ट्रेन शानदार प्रदर्शन करेगी।
3. जर्मिनेशन और सीडलिंग स्टेज | सप्ताह 1
जो लोग पहली बार कैनबिस उगा रहे हैं, उन्हें जर्मिनेशन करते समय घबराहट हो सकती है। लेकिन हम आपको आश्वस्त करना चाहेंगे कि किसी प्रतिष्ठित शॉप से खरीदे गए ताजे और स्वस्थ बीज को अंकुरित करने के लिए सिर्फ तीन चीजें चाहिए—गर्मी, नमी और अंधेरा। ये बीज सस्ते नहीं होते, लेकिन इन्हें अंकुरित करने के लिए आपको अतिरंजित कदम उठाने की जरूरत नहीं है। डरिए मत, चलिए उगाना शुरू करें!

नमी की बात करें तो, कई ग्रोअर्स अपने कैनबिस बीजों को पहले गिलास में पानी में भिगोना पसंद करते हैं (जैसा कि नीचे फोटो में दिखाया गया है)। लेकिन इसमें यह ध्यान रखना जरूरी है कि अगर बीज गिलास के तले में डूब जाए तो ऑक्सीजन न मिलने पर वह दम घुट सकता है। इसे रोकने के लिए बीज को सतह पर तैरने दें जब तक वह क्रैक न हो जाए और टैपरूट न दिख जाए, या फिर बीज को ज्यादा देर तक तले में न रहने दें। आम तौर पर, कुछ ही घंटे काफी होते हैं ताकि नमी अंदर पहुँच कर जर्मिनेशन प्रक्रिया शुरू हो जाए।

अधिकतर ग्रोअर्स बीज को इतना देर तक गिलास में नहीं रखते कि वह क्रैक हो जाएं। वे भिगोए गए बीजों को गीले पेपर टॉवेल पर डालते हैं। यह तरीका इसलिए पसंद किया जाता है क्योंकि इससे हर कुछ घंटों में जर्मिनेशन प्रगति पर नजर रख सकते हैं और अंकुरित बीजों को सही समय पर ग्रोइंग माध्यम में डाल सकते हैं।

जब टैपरूट करीब 1 सेंटीमीटर (आधा इंच) लंबा हो जाए, तो बीज को अपनी पसंद के ग्रोइंग माध्यम जैसे मिट्टी या कोको में डालने का वक्त आ गया है। इसे गहराई में न दबाएं, बस सतह से करीब चौथाई इंच नीचे रखें और ऊपर ढीली, हल्की नमी वाली मिट्टी डाल दें। एक-दो दिन में बीज अंकुरित होकर बाहर आ जाएगा, कभी-कभी तो बाहरी खोल भी हट जाता है।

एक ग्रोअर के रूप में, आपको सबसे पहले यह तय करना होगा कि बीज को फाइनल कंटेनर में लगाना है या स्टार्टिंग कप में। अगर आप बिलकुल नए हैं, तो हम सजेस्ट करेंगे कि ऑटोफ्लावर अपने फाइनल कंटेनर में ही लगाएं। इससे किसी भी तरह के ट्रांसप्लांट शॉक से बचा जा सकता है। स्टार्टर कप का विकल्प अनुभवी ग्रोअर्स के लिए छोड़ दें।

अगर आप शुरू से ही अपने ऑटोफ्लावर को फाइनल कंटेनर में लगाते हैं, तो पानी देने में थोड़ी बाधा आ सकती है। आमतौर पर, आप पूरी कंटेनर को एक बार पानी दें और फिर हर सुबह पौधे के बेस के चारों ओर थोड़े-थोड़े पानी डालें। पहले कुछ दिनों के लिए करीब 50 एमएल प्रतिदिन काफी होंगे।

एक और बात ध्यान रखने वाली है—आपकी छोटी सीडलिंग और लाइट के बीच दूरी। दूरी इतनी हो कि पौधा बेवजह लंबा न खिंचे, लेकिन इतना पास भी न हो कि लाइट स्ट्रेस या लाइट बर्न हो जाए।
4. शुरुआती वेज | सप्ताह 2
कैनबिस पौधे के जीवन के पहले कुछ हफ्ते बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इन्हीं दिनों पर्यावरणीय स्थितियों को आदर्श के करीब रखना आवश्यक है। इसका मतलब है—गर्मी, हल्की नमी बनाए रखना, ताकि सीडलिंग्स को हल्की कंडीशन्स मिलें—ऐसी कंडीशन जिससे अत्यधिक नमी वाष्पीकरण न हो और रूट सिस्टम (जो अभी कमजोर है) पर ज्यादा स्ट्रेस न पड़े।

एक बार फिर, यह बहुत जरूरी है कि आप लगातार अपनी सीडलिंग्स की ऊंचाई को मॉनिटर करें। वे न तो बहुत नीचे रहें, न ही बहुत लंबी-दुबली नजर आएं। पत्तियां ताजगी से भरी दिखनी चाहिए, पर 'प्रेइंग' (लाइट की ओर अत्यधिक झुकाव) नहीं होनी चाहिए।

अगर आप लाइट, तापमान, आद्रता और अन्य पर्यावरणीय कंडीशन्स के 'स्वीट स्पॉट' पर पहुँच गए, तो प्रगति पहले से तेज होगी। हर दिन आपको पंखे वाली पत्तियों के आकार व संख्या में बढ़ोतरी और नोड्स में नई ग्रोथ दिखने लगेगी, जो भविष्य में साइड ब्रांच बनेगी।

न्यूट्रिएंट्स का इस्तेमाल चुने हुए माध्यम पर निर्भर करता है। हाइड्रोपोनिक्स या कोको कोयर में पौधों को शुरू से हर बार पानी के साथ अतिरिक्त पोषक तत्व चाहिए। वहीं सॉइल में, खासकर बड़े कंटेनरों में, माध्यम में दो-तीन हफ्ते बीज से नई पौध तक पर्याप्त पोषक तत्व होते हैं। अगर आप ऑटोफ्लावर्स के लिए बहुत बड़े कंटेनर का इस्तेमाल करते हैं (जो कम समय में फूलते हैं), तो संभव है कि हार्वेस्ट तक अतिरिक्त न्यूट्रिएंट्स की आवश्यकता न पड़े। इसका एक तरीका सुपर सॉइल बनाना है, जिसे नीचे लिंक में बताया गया है।
अब आपका मुख्य फोकस सबसे तेज ग्रोथ नहीं, बल्कि पौधे को स्वस्थ/जीवंत बनाए रखना और उसकी पत्तियों का कलर—गहरा, एकरूप हरा—रखना है।

हर ऑटोफ्लावर का बुश स्ट्रक्चर अलग होता है। कुछ मुख्यत: एक कोला बढ़ाते हैं, बाकी ब्रांच छोटी रह जाती हैं—ऐसी स्ट्रेन्स SOG ग्रोज़ के लिए बढ़िया रहती हैं। कुछ झाड़ीदार होती हैं, जिसे आप शुरुआत में ही नोड्स से निकलती छोटी ब्रांच देखकर जान सकते हैं। ऐसी ऑटोफ्लावर पर विभिन्न ट्रेनिंग टेक्नीक्स जैसे ScrOG सबसे ज़्यादा असरदार होती हैं।

5. मिड वेज | हफ्ते 3-4
हफ्ते 3 और 4 संभवत: आपकी ऑटोफ्लावर के वेजिटेटिव फेज के अंतिम सप्ताह होते हैं, और यही वो समय है जब रूट्स और पौधे का ऊपर वाला हिस्सा सबसे तेज बढ़ता है। यही वह वक्त है जब आप अपने भविष्य की हार्वेस्ट की नींव डालते हैं—नोड्स और ब्रांचेज के रूप में। इसलिए जरूरी है कि आप अपने गार्डन में सबसे अच्छी परिस्थितियाँ बनाएं और ओवरवॉटरिंग व ओवरफर्टिलाइजेशन जैसी सामान्य शुरुआती गलतियों से बचें।

यही वह समय भी है जब आप तय करते हैं कि आपके पौधे की छतरी (canopy) कैसी दिखेगी। बाहर, आप पौधों को प्राकृतिक रूप से बढ़ने दे सकते हैं, लेकिन इंडोर अधिकतर ग्रोअर्स कोई न कोई ट्रेन्ड अपनाते हैं। सबसे साधारण और आम तरीका है LST, और ऑटोफ्लावर के लिए अक्सर यही काफी होता है।

LST यानी लो-स्ट्रेस ट्रेनिंग का मतलब है मुख्य स्टेम और किसी भी ऊँची साइड ब्रांच को झुकाकर बांधना। इसका मकसद 'एपिकल डॉमिनेंस' को तोड़ना है ताकि पौधे की ऊर्जा मुख्य स्टेम से हटकर साइड ब्रांचेज में जाए और पौधा झाड़ीदार बने। दूसरा फायदा यह है कि आप अपनी ऑटो को मनचाहा आकार दे सकते हैं।

आप चाहे ज़्यादा या कम ट्रेनिंग करें, जब तक आप ब्रांच या स्टेम को डेमेज नहीं कर देते, पौधे पर इसका केवल हल्का स्ट्रेस पड़ता है और आधुनिक ऑटोफ्लावर्स इसे आसानी से सह लेते हैं। आजकल के ग्रोअर्स इतने आत्मविश्वासी हैं कि वे HST मैथड भी आजमाते हैं जैसे टॉपिंग या फिमिंग।

अगर पौधा मजबूत और स्वस्थ है, तो हाई-स्ट्रेस ट्रेनिंग भी झाड़ी को 'मॉन्स्टर' में बदल सकती है। हालांकि, शुरुआती के लिए सरल और कम स्ट्रेस वाली ग्रोइंग टेक्नीक ही सही है। आप अपनी ऑटोफ्लावर को नेचुरल बढ़ने भी दे सकते हैं अगर आपके पास हेडस्पेस है—अधिकतर ऑटोफ्लावरिंग वेराइटीज़ इतनी तेज़ और कॉम्पैक्ट हैं कि उनकी साइज कंट्रोल में रहती है।

दूसरी महत्वपूर्ण चीज इस समय यह है कि आपके ऑटोफ्लावर को पर्याप्त न्यूट्रिएंट्स मिलें ताकि वह सक्रिय रूप से ग्रो कर सके। कैनबिस फ़र्टिगेशन अब लगभग एक सटीक विज्ञान बन चुका है, कंपनियाँ नई-नई प्रोडक्ट्स बनाने की होड़ में लगी हैं। लेकिन याद रहे, न्यूट्रिएंट्स का मामला आपके ग्रो करियर की शुरुआत में 'कम ही पर्याप्त' है। शुरुआती कुछ साइकल तक केवल मुख्य मेशमिक्स/उत्पादों से काम चलाएं। नीचे एक सिंपल फीडिंग शेड्यूल है।
यह भी देखा गया है कि अधिकतर ग्रोअर्स अपने पौधों को ट्रेन करते हैं और वह काम काफी जल्दी ही शुरू कर देते हैं—यह सोचकर कि कहीं साइज समस्या न बन जाए।

वीड पौधों की खासियत है कि अगर उन्हें फ़ीडिंग रेजीम या कुछ और पसंद नहीं आएगा तो वह पत्तियों के रंग या आकार से आपको दिखा देंगे कि वे खुश नहीं हैं। आपका गोल है कि पत्तियाँ चमकदार हरी, समतल और ताजा दिखें—इसका मतलब है कि पौधा सही चल रहा है। तब वे लगातार बढ़ते हैं, हर सुबह नई ग्रोथ दिखती है।

6. ट्रांजिशन (प्री-फ्लावर) | हफ्ता 5
कैनबिस पौधों में प्री-फ्लावर स्टेज ग्रोअर्स के लिए महत्वपूर्ण समय है, क्योंकि इसी दौरान पौधों का लिंग पहचाना जा सकता है। ऑटोफ्लावरिंग वेराइटीज़ में फ्लावरिंग लाइट साइकल बदलने से नहीं, बल्कि जेनेटिक्स और उम्र से स्वत: शुरू हो जाती है। हालांकि आम तौर पर फ्लावरिंग स्टार्ट के बाद ग्रोइंग कंडीशन्स बदलने की जरूरत नहीं होती, लेकिन कुछ ग्रोअर्स बेहतर पैदावार के लिए बदलाव करते हैं। फ्लावरिंग स्टेज के दौरान तापमान, आद्रता और लाइट इंटेन्सिटी पर ध्यान देना जरूरी है।

शुरुआती ग्रोअर्स को जानकर आश्चर्य हो सकता है, लेकिन सेक्स के पहले संकेत पौधे के शीर्ष पर नहीं, बल्कि निचले नोड्स पर मिलते हैं। फीमेल पौधों में यह सफेद बालों की जोड़ियों के रूप में दिखता है। ध्यान से देखने पर ही ये नग्न आँखों से नजर आते हैं, क्योंकि ये बहुत छोटे होते हैं।

फूल आने के शुरुआती संकेत आपसे छुपे नहीं रहेंगे। पौधे के हरे शीर्ष, जो पहले नीचे की पत्तियों के समान थे, अब पीले रंगत के होने लगते हैं। नई पत्तियाँ भी पतली और कोमल होती जाती हैं।

इसी के साथ, नाजुक नई पत्तियों के बीच छोटे-छोटे सफेद बाल उभरने लगते हैं और कुछ समय बाद पौधे के शीर्ष डील-डौल फूले हुए और 'कली' जैसे दिखने लगते हैं।

कुछ ग्रोअर्स, जो ट्रेनिंग के शौकीन होते हैं, फ्लावरिंग स्टेज में भी LST जारी रखते हैं। हालांकि, इससे कभी-कभी कैनोपी बहुत घनी हो जाती है और हवा व लाइट पहुँचने में बाधा आ सकती है। ऐसे में, पंखे वाली पत्तियाँ (फैन लीव्स) हटानी पड़ सकती हैं, कभी-कभी बहुत सारी भी।
हम हमेशा सलाह देंगे कि जब भी डिफोलीएट करें तो उसके पीछे स्पष्ट कारण हो। सिर्फ इसलिए न तोड़ें कि कर सकते हैं या दूसरे करते हैं। सही कारण यही है कि पत्तियाँ बड साइट्स को छाँव दें या कैनोपी के अंदर हवा का प्रवाह रोकें।

जहाँ LST से अपने मसले होते हैं, वहीं ट्रेनिंग न करने पर भी तंग जगह में समस्या हो सकती है, जैसे कि मुख्य कोला बाकी ब्रांचेस के मुकाबले बहुत ऊँचा हो जाए, जिससे वह लाइट के बहुत पास चला जाए या आपको लाइट को ऊपर-ऊपर करना पड़े—यहां तक कि निचली ब्रांचेस लाइट से बाहर हो जाएँ। ऐसे केस में आपको कभी-कभी सुपर क्रॉपिंग जैसे तीव्र उपाय आजमाने पड़ते हैं, लेकिन फ्लावरिंग स्टेज में यह नहीं करना चाहिए, वर्ना पैदावार में कमी आएगी। आदर्शतः, हर मुख्य ब्रांच की लंबाई समान होनी चाहिए और लाइट से बराबर दूरी पर होनी चाहिए।

इस स्टेज पर फूल पूरी तरह नहीं बने हैं, इसलिए पौधे को फोस्फोरस और पोटैशियम (N-P-K के PK भाग) की बहुत ज्यादा जरूरत नहीं होती। कुछ ग्रोअर्स बूम न्यूट्रिएंट्स एक हफ्ता और लेट कर देते हैं, जबकि ज्यादातर इन पौधों के फ्लावरिंग शुरू होते ही न्यूट्रिएंट शेड्यूल को फ्लावरिंग के अनुरूप एडजस्ट कर देते हैं।
7. अर्ली फ्लावर | हफ्ते 6-7
कैनबिस पौधों के अर्ली फ्लावरिंग स्टेज में वे 'स्ट्रेच' के नाम से जानी जाने वाली तेजी से वृद्धि करते हैं, जिसमें वे ऊँचे हो सकते हैं और फूल बनने लगते हैं। यह फेज, विशेष स्ट्रेन व पर्यावरण के अनुसार, तीन हफ्ते तक चल सकता है। इस दौरान लाइट की दूरी बेहद अहम है, जिससे लाइट बर्न रोकी जा सके और फूलों का विकास उत्तम हो। साथ ही पानी और न्यूट्रिएंट्स की मात्रा बढ़ानी पड़ती है, पर ओवरफ़ीडिंग से बचना चाहिए—वरना न्यूट्रिएंट बर्न आदि समस्याएं हो सकती हैं। ओवरफीडिंग के संकेतों के लिए पत्तियों की निगरानी जरूरी है।

नई ग्रोअर्स के लिए आश्चर्यजनक हो सकता है कि इस स्टेज में पौधे का डंठल और ब्रांचेज लंबी होते हैं—असली फूल बाद में बड़े होंगे। इस वृद्धि में पौधा अपनी साइज दोगुना या तिगुना कर सकता है।

शुरुआती फूल छोटे दिखेंगे, लेकिन समय के साथ वे भर जाएंगे और लंबी, एकसाथ कोलाज में बदल जाएंगे।

ट्रेनिंग के जरिए इस वृद्धि को बग़ल में फैलाया जा सकता है। बस यह सुनिश्चित करें कि आपके पास पर्याप्त जगह हो।

इस टाइमलाइन पर, बड्स के छोटे आकार से धोखा न खाएं—यह फ्लावरिंग ही है, इसलिए पौधों को अब फ्लावरिंग न्यूट्रिएंट्स चाहिए (और हफ्ते-दर-हफ्ते यह जरूरत बढ़ती जाएगी)। नाइट्रोजन-समृद्ध प्रोडक्ट्स अगली साइकल तक के लिए साइड में रखें और अब वे न्यूट्रिएंट्स दें जिनमें फोस्फोरस व पोटैशियम ज्यादा है।
बडिंग स्टेज के लिए फीङ्ग शेड्यूल नीचे टेबल में देखें। नए ग्रोअर्स के लिए यह बहुत कॉम्प्लिकेटेड लग सकता है, इसलिए बेसिक फॉर्मूला ही आजमाएं, एडवान्स्ड सप्लीमेंट बाद में रखें—जब थोड़ा अनुभव हो जाए।

अगर पौधा अपनी ब्रांच फैलाने न पाए तो देखें कि कैनोपी में रोशनी और हवा पहुंच सके। कभी पत्तियाँ मोड़कर ये हो सकता है, पर बहुत घनत्व आए तो डिफोलिएशन ज़रूरी बन जाता है।

8. मिड फ्लावर (बल्क फेज) | हफ्ते 8-9
जब कैनबिस पौधों में बड्स जमा होने लगते हैं, तो उनकी ऊँचाई नहीं बढ़ती, इसलिए अब स्पेस की चिंता नहीं करनी पड़ती। अब आपको पोषक तत्वों की सही मात्रा देना है। साथ ही हवा का प्रवाह भी आवश्यक है ताकि मोल्ड व बड रोट से बचा जा सके। इसके लिए आद्रता कम रखें और बढ़िया वेंटिलेशन दें। तापमान थोड़ा कम करना भी फायदेमंद रहेगा, इससे बड्स के टरपीन व THC बचाए रहेंगे।

फूल मोटे होते वक्त पौधे बहुत ज़्यादा 'भूखे' होते हैं, खासकर फॉस्फोरस (P) और पोटैशियम (K) के। ध्यान रहे, बहुत ज्यादा न दें वर्ना पत्तियों के टिप जल सकते हैं। इस वक्त अधिकतर बाल अभी सफेद होते हैं, कुछ ब्राउन भी होने लगते हैं—इसका मतलब हार्वेस्ट करीब है। नीचे फोटो वाला मिमोसा केक ऑटो अच्छे से भर रहा है, लेकिन अभी पूरी तरह तैयार नहीं है।

मजबूत लाइट हो तो ऑटोफ्लावर को जैसे चाहे वैसे विकसित होने दें। लाइट नीचे तक पहुँचेगी। मुख्य कोला सबसे बड़ा होगा, लेकिन निचले फूल भी घने और बड़े होंगे।

छोटे ग्रो सेटअप में ट्रेनिंग जरूरी हो जाती है, जिससे हर कोला क्वालिटी वाला बने। लेकिन डिफोलिएशन करते वक्त याद रखें, फैन लीव्स पोषक तत्व संग्रहित करती हैं और जरूरत पड़ने पर फूल में देती हैं। अगर आप ज्यादा फैन लीव्स हटा लेते हैं, तो पौधा छोटी नई पत्तियाँ खुद इस्तेमाल करने लग सकता है, जिससे वे समय से पहले पीली हो जाती हैं।

मिमोसा केक ऑटो लम्बा भी बढ़ सकता है, लेकिन फाइनल साइज ज्यादा ट्रेनिंग पर निर्भर करती है और पूरी तरह कंट्रोल में है। नीचे चारों ग्रो का हाइट डाटा देखें:

अगर बड़े पैमाने पर ग्रो करें तो ध्यान रखें कि एक भी पौधा गंध करता है—ज़्यादा हुए तो गंध बहुत बढ़ जाती है, कार्बन फिल्टर का इस्तेमाल करें।

9. पकना और हार्वेस्ट | हफ्ते 10-11
ऑटोफ्लावर के जीवन के अंतिम हफ्तों में, दिन व रात दोनों में आद्रता कम और तापमान ठंडा रखें। ज्यादा आद्रता बड़े बड्स के लिए हानिकारक होती है, इसलिए इसका विशेष ध्यान रखें। ठंडा तापमान टरपीन और THC को बरकरार रखता है।

अंतिम हफ्तों में, हार्वेस्टिंग से पहले, आपके बड्स का आकार बहुत नहीं बढ़ेगा, पर अभी भी कई महत्वपूर्ण बदलाव होंगे। बड्स ज्यादा घने हो जाएंगे, जिससे वे भारी लगेंगे, और ट्राइकोम्स में THC स्तर और बढ़ जाएगा। अतः बड्स का साइज देखकर हार्वेस्ट के लिए न सोचें, बल्कि अन्य संकेत देखें कि कब काटना ठीक है।

ब्रीडर की स्पेसिफिकेशन से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पौधा कब कटाई के लायक होगा, लेकिन यह सबसे सटीक तरीका नहीं है क्योंकि फेनोटाइपिक फर्क व अन्य कारणों से फ्लावरिंग में अंतर हो सकता है। ज्यादा बेहतर तरीका यह है कि बड्स पर मौजूद फीमेल बालों (पिस्टिल्स) का रंग देखें। जब तक ये सफेद हैं, बड्स तैयार नहीं होते, जब भूरे या नारंगी हो जाएं तो हार्वेस्ट विंडो पास है। एक और संकेत यह है कि पत्तियाँ फीकी पड़ने लगती हैं और पौधे में 'शरद' जैसा अहसास होता है।

अपने पौधे की हार्वेस्ट रेडीनेस जानने का सबसे विश्वसनीय तरीका है 60X हैंड माइक्रोस्कोप से उसके ट्राइकोम्स देखें। इससे पता चलेगा कि THC कब पीक पर है। जब ट्राइकोम्स साफ हों, THC कम रहता है। जब बादली या दूधिया दिखने लगें तो THC सबसे ज्यादा होता है, और फिर ये एम्बर कलर होते हैं (यानि डिग्रेडेशन)।

ट्राइकोम्स के मैच्योर होने का इंतजार करते हुए, न्यूट्रिएंट देना बंद करें और केवल पानी दें। इसे फ्लशिंग कहा जाता है, सॉइल में दो हफ्ते तक चल सकती है, हाइड्रो/कोको में कम। इससे सॉल्ट्स निकल जाते हैं और स्मोक प्योर व स्मूद बनती है। फ्लशिंग के दौरान पौधा जमा स्टोर को इस्तेमाल करता है और पत्तियाँ भी फीकी पड़ती जाती हैं।

10. सुखाना और क्योरिंग
हार्वेस्ट के बाद भी सुखाने और क्योरिंग की सही प्रक्रियाएँ जरूरी हैं। दोनों काम में समय और धैर्य रखें। सुखाने के लिए ठंडी, वेंटिलेटेड जगह चुनें, इसमें 7-10 दिन तक भी लग सकते हैं। जब बड्स की नमी लगभग चली जाए तो ब्रांच से अलग कर जार में क्योरिंग के लिए 2-3 हफ्ते (या ज्यादा) रखें। रोज 1-2 बार जार खोल कर 'बर्प' जरूर करें वर्ना बड्स में फंगस लग सकती है।
11. परिणाम
सामने आईं सभी मिमोसा केक ऑटो ग्रो डायरीज़ को देखकर स्पष्ट है कि यह ऑटोफ्लावर बहुत प्रोडक्टिव है—बहुत सी ब्रांचेज पर बड़े, घने, भारी बड्स लगते हैं। यानी, हर सेटअप और किसी भी मेथड पर ग्रो करें, बड़ी पैदावार की गारंटी है।

पहले ग्रोअर ने मिमोसा केक ऑटो को छोटा और कैनोपी समतल रखा, जिससे बड्स समान, घने और रेजिन से लदे हुए निकले। कुल वजन 51 g (1.8 oz) ड्राई में आया।

दूसरे ग्रोअर ने मिमोसा केक ऑटो को काफी ज्यादा स्ट्रेच होने दिया, लेकिन उनके बड़े लाइट ने एक्सट्रा दूरी को संभाल लिया। इंटरनोड्स लंबी हो गईं, लेकिन निचले बड्स भी घने और भारी रहे, कुल वजन 115 g (4.06 oz) ड्राई और क्योर में।

तीसरे ग्रोअर का मिमोसा केक ऑटो पौधा बड़ा और झाड़ीदार था, जिसमें कुल बड्स का वजन 97.16 g (3.43 oz) था—इतनी कम-फूलने वाली स्ट्रेन के लिए चौंकाने वाला।

आखिरी, चौथे ग्रोअर ने अपने तीन मिमोसा केक ऑटो पौधों को खुला छोड़ दिया और एक लंबी ब्रांच को सुपरक्रॉप करने के बाद भी उसका यील्ड अन्य सभी में सबसे ज्यादा रहा—कुल 464 g (16.37 oz), यानी प्रति पौधा 155 g (5.47 oz)।

13 ग्रोअर के स्मोक रिपोर्ट्स का विश्लेषण करने पर पाया गया कि बड्स में आमतौर पर मीठी, फलादार खुशबू—केक या नींबू के हल्के सुगंध के साथ—आती है। स्वाद अक्सर मिट्टी जैसा, केक या सिट्रस नोट्स के साथ होता है। असर ज्यादातर उत्साहवर्धक और युफोरिक, आखिर में सुकून देने वाला, रहता है। यह स्ट्रेन दिन में इस्तेमाल के लिए सुझावित है, क्योंकि यह उत्पादकता बनाए रखता है जबकि प्रभाव शानदार रहता है। कुलमिलाकर, मिमोसा केक ऑटो ताकतवर, स्वादिष्ट और संतुलित असर वाली स्ट्रेन है।

11. निष्कर्ष
जैसा कि हमने अपने वीक-बाय-वीक गाइड में देखा, मिमोसा केक ऑटो आसान ग्रो चाहने वालों के लिए स्पष्ट चॉइस है। किसी ने भी हाई-स्ट्रेस कैनोपी मैनेजमेंट तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया, दो ने बहुत LST की जिससे स्पेस व लाइट बेहतर मिली और हार्वेस्ट में शानदार नतीजे आए। बाकी दो ने ट्रेनिंग का कम इस्तेमाल किया, फिर भी औसत से बढ़िया परिणाम मिले।
मिमोसा केक ऑटो ने भारी डिफोलिएशन को भी झेला और एक केस में सुपरक्रॉपिंग पर भी अच्छा रिस्पॉन्स दिया।
एक और बात नोट की गई, चार में से तीन लोगों ने माध्यम के लिए मिट्टी चुना और उनका यील्ड कोको वाले से भी बेहतर रहा। इसका मतलब यह नहीं कि कोको कम अच्छा है, बल्कि यह कि बेसिक सॉइल भी बेहतरीन नतीजों की गारंटी देता है।
आपका पसंदीदा ग्रोइंग स्टाइल या अनुभव स्तर चाहे जो भी हो, मिमोसा केक ऑटो ज़रूर शानदार परिणाम देगी। हैप्पी ग्रोइंग!
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