ऑटोफ्लावर को कैसे फ्लश करें?
- 1. फ्लशिंग क्या है?
- 2. कैनाबिस पौधों को फ्लश क्यों करें?
- 3. ऑटोफ्लावर को कब फ्लश करें?
- 4. कटाई से पहले पौधे क्यों फ्लश किए जाते हैं?
- 5. न्यूट्रिएंट लॉक-आउट के दौरान पौधे क्यों फ्लश करें?
- 6. ऑटोफ्लावरिंग कैनाबिस पौधों को फ्लश कैसे करें?
- 7. क्या ऑर्गेनिक मिट्टी में फ्लशिंग हो सकती है?
- 8. निष्कर्ष
अगर आप कुछ बेहतरीन कलियाँ कटाई करना चाहते हैं तो अपनी कैनाबिस पौधों को फ्लश करना ज़रूरी है। आमतौर पर सामान्य कैनाबिस पौधों में यह काफ़ी आसान है, लेकिन ग्रोअर अकसर सोचते हैं कि ऑटोफ्लावर को कैसे फ्लश करें। ऑटोफ्लावर को फ्लश करना लगभग फोटो पौधों की तरह ही है, लेकिन ऑटो के पास बढ़ने के लिए सीमित समय होता है, इसलिए सिर्फ़ आखिरी हफ्ते में ही फ्लश करें। और, यह ऑटो का जीवनचक्र होने की वजह से है। कुछ ग्रोअर अपनी कैनाबिस पौधों को फ्लश करना छोड़ देते हैं और इंडिकेट करते हैं कि फ्लश और नॉन-फ्लश कलियों में अंतर महसूस नहीं होता। वहीं कई ग्रोअर मानते हैं कि फ्लश करने से कलियाँ स्वादिष्ट और स्मोकिंग में स्मूद हो जाती हैं।
आखिरकार, यह व्यक्तिगत अनुभव और पसंद की बात है। हालांकि, कैनाबिस फ्लशिंग का सिद्धांत समझ में आता है और ज्यादा ग्रोअर हर बार इस प्रक्रिया को फॉलो करते हैं जब वे पौधों को उगाते हैं। ऐसा माना जाता है कि न्यूट्रिएंट्स को सीमित करके, पौधे अपनी कलियों और पत्तियों में जमा हुए रिजर्व का उपयोग करने लगते हैं। यह शेष कंपाउंड्स भी हटा देता है, जो टेर्पीन प्रोफाइल की शुद्धता में बाधा डालते हैं। इस आर्टिकल में, आप फ्लशिंग के बारे में सब कुछ और कब करना है, जानेंगे।
1. फ्लशिंग क्या है?
फ्लशिंग का मतलब है अपनी कैनाबिस पौधों को डिटॉक्सिफाई करना। इसका उद्देश्य सभी न्यूट्रिएंट्स हटाना है, जो आपने ग्रो और फ्लावरिंग साइक्ल के दौरान पौधों को दिए थे। जैसे इंसान का शरीर डिटॉक्सिफिकेशन मांगता है, वैसे ही पौधे के साइकल के आख़िर में न्यूट्रिएंट्स को हटाना ज़रूरी है। हालांकि, पौधों के लिए न्यूट्रिएंट्स टॉक्सिन्स नहीं होते, लेकिन अगर ये ज़्यादा मात्रा में फूलों में इकट्ठा हो जाएं तो अंत में उपज का स्वाद खराब करते हैं।
अगर आपने कभी डिस्पेंसरी या कॉफी शॉप से प्रीमियम फ्लावर स्मोक किया हो, तो आपको बहुत स्मूद और स्वादिष्ट अनुभव याद होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन कलियों को फ्लश किया गया था जिससे नाइट्रोजन जैसी कठोर चीजें हट गईं थीं, जो स्वाद में कड़वाहट लाती हैं।

फ्लशिंग के लिए सादा पानी (बिना किसी न्यूट्रिएंट्स के) देना होता है। आमतौर पर आप यह साइकल के आखीर में करते हैं जब कलियाँ एम्बर रंग की होने लगती हैं। फ्लश करने से पहले पानी का pH सही होना चाहिए। फ्लशिंग के लिए बिल्कुल सिंपल सादा पानी लें, कोई न्यूट्रिएंट्स या सप्लीमेंट नहीं डाले। अगर आप सप्लीमेंट मिला देंगे तो फ्लशिंग का मकसद ही बेकार हो जाएगा।
2. कैनाबिस पौधों को फ्लश क्यों करें?
कई कैनाबिस ग्रोअर फ्लशिंग को ज़रूरी नहीं मानते। वास्तव में, कोई ठोस सबूत नहीं है कि फ्लशिंग मदद करता है क्योंकि पौधे अलग-अलग तरीके से न्यूट्रिएंट्स को सहेजते हैं। फिर भी आप स्वाद का थोड़ा फर्क महसूस करेंगे अगर आप फ्लशिंग करें। इसके अलावा फ्लशिंग रासायनिक स्वाद को भी खत्म कर देता है जो कलियों की फाइनल गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाता है। फ्लशिंग से उम्दा स्मूदनेस भी आती है। हालांकि क्योरिंग करने से भी स्मूदनेस आती है, मगर फ्लशिंग से यह और बेहतर हो जाती है।
कई ग्रोअर यह नहीं सोचते कि फ्लशिंग कुछ मामलों में पुरजोर स्वाद और शक्ति ना भी बढ़ाए, मगर यह कम भी नहीं करता। यह क्यों ज़रूरी है? क्योंकि कुछ ग्रोअर तीन हफ्ते तक फ्लश करते हैं, तो कुछ पूरा न्यूट्रिएंट्स रेजिमेन देते रहते हैं। अगर दोनों स्थितियों में कलियाँ बराबर क्वालिटी की होती हैं, तो फ्लश करने वाले ने तीन हफ्ते के न्यूट्रिएंट्स बचा लिए, जिन्हें अगले ग्रो में इस्तेमाल किया जा सकता है।
3. ऑटोफ्लावर को कब फ्लश करें?
फ्लशिंग सही ढंग से करें तो ही कलियों की क्वालिटी सुधरती है। तो, कितनी बार फ्लश करें? यह आपके मकसद पर निर्भर है, लेकिन आमतौर पर आपको 3-5 बार फ्लश करना चाहिए, हर बार सब्सट्रेट के सूखने के बाद, जिससे पूरा प्रोसेस 1-2 हफ्ते चला सकता है।
अब, अगर आप सोच रहे हैं कि ऑटोफ्लावर को कब फ्लश करना चाहिए, तो जान लें कि फ्लशिंग दो स्थितियों में की जाती है:
- कटाई से ठीक पहले
- न्यूट्रिएंट लॉक-आउट के दौरान
4. कटाई से पहले पौधे क्यों फ्लश किए जाते हैं?
जैसा कि पहले बताया गया, पौधों को कटाई से पहले (कम से कम 2 हफ्ते, मगर यह ग्रोइंग स्टाइल पर निर्भर करता है) फ्लश किया जाता है ताकि अतिरिक्त न्यूट्रिएंट्स निकल जाएं। उदाहरण के लिए, अगर आपके पौधे का फ्लावरिंग पीरियड 10 हफ्ते का है, तो आप 8 हफ्ते के बाद फ्लशिंग शुरू कर सकते हैं। लेकिन, यह पक्का कर लें कि पौधा लगभग तैयार हो चुका है। इसका मतलब, ट्राइकोम्स चेक करें; अगर सारी कलियाँ सिर्फ़ क्लियर ट्राइकोम्स से भरी हैं, तो और इंतजार चाहिए। ट्राइकोम्स देखकर ही कटाई और फ्लशिंग की सही टाइमिंग चुनें।
इसके लिए आपको ज्वैलर्स लूप या पॉकेट माइक्रोस्कोप की ज़रूरत पड़ेगी। ट्राइकोम्स जैसे-जैसे पकते हैं, उनकी बनावट क्लियर से क्लाउडी और फिर एम्बर रंग में बदल जाती है। इंडिका और सटिवा प्रधान स्ट्रेनों के इफेक्ट्स तो सभी जानते हैं, मगर ट्राइकोम्स की परिपक्वता का भी साइकोऐक्टिव इफेक्ट पर फर्क पड़ता है।

जितना ज्यादा ट्राइकोम्स पके, और जितने ज्यादा एम्बर रंग के हों, उतना ज्यादा "काउच-लॉक" इफेक्ट होता है — एक हद तक। अगर आप ज़्यादातर क्लियर ट्राइकोम्स वाली कलियों को काटते हैं, तो हाई असरदार और क्लियर होगा। 70% एम्बर और 30% क्लाउडी ट्राइकोम्स (आम कटाई पॉइंट) पर THC उत्पादन पीक पर रहता है। कुछ ग्रोअर और इंतजार करते हैं ताकि ज्यादा एम्बर ट्राइकोम्स बनें और साथ ही CBN भी बढ़े, जिससे रिलीक्सिंग और सिडेटिंग हाई मिलता है।
सभी ऑटोफ्लावर में एक निश्चित फ्लावरिंग साइकल होती है, लेकिन टाइमिंग न्यूट्रिएंट्स, स्पेस और ग्रोइंग स्टाइल के हिसाब से बदल सकती है। उदाहरण के लिए, यदि आपने Gorilla Glue Auto लगाया, जिसकी फ्लावरिंग साइकल 8-9 हफ्ते है, तो 6वें या 7वें हफ्ते से फ्लशिंग शुरू कर सकते हैं। फिर भी, उसे कभी-कभी 10-11 हफ्ते का समय लग सकता है।
यह न्यूट्रिएंट्स या तापमान जैसे कारणों से हो सकता है। इसलिए फ्लशिंग शुरू करने से पहले ट्राइकोम्स और पिस्टिल्स का रंग अच्छी तरह देखें। मैग्नीफाइंग ग्लास से ट्राइकोम्स चेक करना सबसे अच्छा तरीका है। ट्राइकोम्स सबसे पहले क्लियर होते हैं, फिर क्लाउडी और फिर थोड़ा मिल्की रंग के हो जाते हैं। जैसे ही वे क्लाउडी/मिल्की दिखें, फ्लशिंग शुरू कर दें। ऑटो का फ्लशिंग प्लान बनाकर करें। अगर आप गलत समय पर फ्लश करते हैं तो पौधे को अपने ही भोजन से वंचित कर देंगे और पौधा कमजोर हो जाएगा।
5. न्यूट्रिएंट लॉक-आउट के दौरान पौधे क्यों फ्लश करें?
कई बार आप ऑटोफ्लावर को इतना ज्यादा न्यूट्रिएंट्स दे देते हैं कि न्यूट्रिएंट लॉक-आउट हो जाता है, यानी पौधा खुद को फीड नहीं कर पाता। इस हालत में पैदावार कम हो जाती है। अगर पत्तियां जली हुई या असामान्य गहरे हरे रंग की लगें, तो यह न्यूट्रिएंट लॉक-आउट की निशानी है। ज़्यादा न्यूट्रिएंट्स, खासकर नाइट्रोजन, से भी न्यूट्रिएंट लॉक-आउट हो सकता है, जिससे पत्ते पंजे जैसे दिखने लगते हैं।
ऐसी स्थिति में, पौधे को सामान्य अवस्था में लाना ज़रूरी है। यह काम सिर्फ़ फ्लशिंग से होता है। फ्लशिंग अतिरिक्त न्यूट्रिएंट्स निकाल देता है और पौधा फिर से सामान्य तरीके से बढ़ता है। हालांकि, तुरंत सुधार नहीं दिखेगा, लेकिन कम से कम 2-3 दिन में पौधा रिकवर करने लगता है।
ध्यान रखें, अतिरिक्त केमिकल हटाने के लिए फ्लशिंग वेजेटेटिव स्टेज में होती है, लेकिन स्मूथ बड्स के लिए फ्लशिंग फाइनल फ्लावरिंग स्टेज में की जाती है। दोनों में फर्क है। FastBuds में हम नए ग्रोअर को मुख्य सब्सट्रेट के रूप में कोको-कोयर इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं। कोको-कोयर एक बेहतरीन मेडियम है; यह सॉइल और हाइड्रोपोनिक दोनों के फायदों को मिलाकर सारी कमियां दूर कर देता है।
यह सॉइल से 70% ज्यादा ऑक्सीजन रोकता है, रूट बॉल को अच्छा सपोर्ट देता है और बहुत आसानी से फ्लश हो जाता है। आजकल लगभग हर पोषक तत्व कंपनी का कोको-कोयर मिक्स उपलब्ध है और बीते चार सालों में कीमत भी काफी कम हो गयी है।
6. ऑटोफ्लावरिंग कैनाबिस पौधों को फ्लश कैसे करें?
ऑटो फ्लशिंग काफी आसान है। कल्पना कीजिए आपके पौधे फ्लश के लिए तैयार हैं। अगर आप रोज़ाना 2-3 लीटर पानी दे रहे हैं, तो फिर pH सही कर के वही सादा पानी दें, कोई न्यूट्रिएंट न मिलाएं। अगर कंटेनर 3 गैलन का है, तो 6-10 गैलन पानी से एक्स्ट्रा न्यूट्रिएंट्स निकाल सकते हैं।

आमतौर पर नल का पानी फ्लशिंग के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन, pH पर नज़र रखें। अगर आपको नल के पानी के क्लोरीन से दिक्कत है, तो उसे 24 घंटे खुले में छोड़ दें। अपने पॉट्स में तब तक पानी डालते रहें जब तक निचे से पानी बह कर न निकलने लगे। निकला हुआ पानी अतिरिक्त केमिकल्स के कारण गंदा दिख सकता है। PPM चेक करने के लिए TDS मीटर का इस्तेमाल करें। फ्लश के दौरान PPM 1500 तक जा सकता है। तब तक फ्लश करें जब तक PPM घटकर 50 न रह जाए। अगर इतना कम नहीं होता, तो कम से कम नल के पानी जितना PPM लाएं।
एक सामान्य तरीका डबल फ्लश मेथड है। इसमें पॉट्स में जितना पानी आ सके उतना पानी डालते हैं, 10 मिनट या जब तक ज्यादा पानी बाहर न निकल जाए, तब तक इंतजार करते हैं। फिर वही पानी दोबारा डालते हैं। यह तरीका खासकर कोको-कोयर ग्रो में बहुत असरदार है। सबसे अच्छे नतीजे के लिए कोशिश करें पौधों को गर्म पानी (ल्यूकवॉर्म) से फ्लश करें। कैन? क्योंकि अधिकतर केमिकल्स गर्म पानी में ज्यादा अच्छे से घुल जाते हैं।
7. क्या ऑर्गेनिक मिट्टी में फ्लशिंग हो सकती है?
ऑर्गेनिक/सुपर सॉइल और केमिकल्स इस्तेमाल में बहुत फर्क होता है। अगर पौधे ऑर्गेनिक मिट्टी में हैं, तो फ्लशिंग न करें वरना आप मिट्टी में मौजूद माइक्रोओर्गेनिज्म्स को मार देंगे। माइक्रोब की इकोसिस्टम बनने में समय लगता है—फ्लश करने से वह सब बिगड़ जाएगा। वैसे भी आप ऑर्गेनिक सॉइल में रहकर असली फ्लशिंग नहीं कर सकते। इनेर्ट ग्रोइंग मीडियम और सिंथेटिक न्यूट्रिएंट्स इस्तेमाल करने वाले तो आसानी से फ्लशिंग कर सकते हैं। लेकिन लिविंग सॉइल डायनामिक सिस्टम है जिसमें माइक्रोब्स हमेशा न्यूट्रिएंट्स को साइकिल करते रहते हैं।
फंगस और बैक्टीरिया अपने बाहरी वातावरण में एंजाइम्ज छोड़ते हैं, जो बड़े पोलिमर को छोटे मोनिमर में तोड़ता है। इन्हें उपभोग करके न्यूट्रिएंट्स पौधों तक पहुंच जाते हैं। जब नीमेटोड्स और वर्म्स जैसे प्रीडेटर इन सूक्ष्मजीवों को खाते हैं, तो पौधे के लिए उपलब्ध नाइट्रोजन और अन्य न्यूट्रिएंट्स रिलीज़ होते हैं। केवल पानी देने से भी कुछ न्यूट्रिएंट्स साइक्लिंग ऑर्गेनिक मीडियम में जारी ही रहती है।

माइक्रोब्स और अन्य सूक्ष्मजीव पहले ही पौधे को पोषण देने का बढ़िया काम कर रहे हैं, इसलिए आपको टांग अड़ाने की ज़रूरत नहीं है। सॉइल का इकोसिस्टम बहुत नाज़ुक होता है — और आपने अगर अपनी सुपर सॉइल खुद बनाई है, तो सारा श्रम बर्बाद हो जाएगा। बहुत लोग ऑर्गेनिक कैनाबिस इसलिए उगाते हैं क्योंकि वे केमिकल्स में विश्वास नहीं करते। ऐसे पौधों की फ्लशिंग ज़रूरी नहीं है क्योंकि स्मोकिंग के समय स्वाद बिगड़ता नहीं। क्योरिंग चाहिए ही चाहिए, लेकिन फ्लशिंग ज़रूरी नहीं।
अंत में याद रखें, फ्लशिंग बड्स के स्वाद को बेहतर बनाती है। एक पौधे को फ्लश कर के खुद फर्क महसूस करें। फ्लशिंग + क्योरिंग = जबरदस्त स्वाद - इसलिए अपनी ऑटोफ्लावरिंग कैनाबिस पौधों को फ्लश करना मत भूलें!
6. निष्कर्ष
तो, उम्मीद है हमने फ्लशिंग प्रक्रिया को आसान और समझने लायक तरीके से बताया है। सच में यह बहुत आसान है। डबल फ्लश करें गुनगुने पानी से, रनऑफ चेक करें कि हर फ्लश के बाद कम हो रहा है यहां तक कि 50 PPM (या आपके नल के पानी के समान) से नीचे आ जाए, और कम से कम एक हफ्ते तक फ्लश करें। सिंपल!
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